नई दिल्ली, : बरसाने की लट्ठमार होली न सिर्फ देश में बल्कि पूरी दुनिया में भी काफी मशहूर है। फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की नवमी को बरसाने में लट्ठमार होली मनाई जाती है। नवमी के दिन यहां का नज़ारा देखने लायक होता है। यहां लोग रंगों, फूलों के अलावा डंडों से होली खेलने की परंपरा निभाते हैं।
मान्यता है कि द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण फागुन सुदी नवमी को होली खेलने बरसाना गए और बिना फगुवा (नेग) दिए ही वापस लौट आए। राधाजी ने बरसाना की सभी सखियों को एकत्रित किया और बताया कि कन्हैया बिना फगुवा दिए ही लौट गए हैं। हमें नंदगांव चलकर उनसे फगुवा लेना है। अगले दिन ही (दशमी) को बरसाना की ब्रजगोपियां होली का फगुवा लेने नंदगांव आती हैं। कन्हैया की इसी लीला को जीवंत रखने के लिए यहां भी लठामार होली का आयोजन किया जाता है।
3 मार्च को अष्टमी के दिन बरसाने में खेली जाएगी लड्डू होली।
4 मार्च को बरसाने में लठमार होली।
5 मार्च को दशमी के दिन नन्दगांव व रावल गांव में लठमार होली।
6 मार्च को श्रीकृष्ण जन्मभूमि एवं ठा. बांके बिहारी मंदिर में क्रमशः सांस्कृतिक कार्यक्रम एवं होली।
7 मार्च को गोकुल में छड़ीमार होली।
3 मार्च: बरसाने की लड्डू होली
लड्डू होली की शुरुआत लाडली मंदिर से होती है। दुनिया के हर कोने से आए राधा-कृष्ण के भक्त एक दूसरे को लड्डू और अबीर-गुलाल लगाते हैं। ऐसा माना जाता है कि लड्डू की होली खेलने की परंपरा श्रीकृष्ण के बचपन से जुड़ी है। कहा जाता है कि जब भगवान श्रीकृष्ण और नंद गांव के सखाओं ने बरसाना में होली खेलने का न्योता स्वीकार कर लिया था, तब पहले वहां खुशी में लड्डू की होली खेली गई थी।
4 और 5 मार्च: लट्ठमार होली - बरसाने और वृंदावन
बरसाने में 4 मार्च को और नंदगांव में 5 मार्च को लठमार होली खेली जाएगी। नंदगांव से सखा बरसाने आते हैं और बरसाने की गोपियां उन पर लाठियां बरसाती हैं। बरसाना के अलावा मथुरा, वृंदावन, नंदगांव में लठमार होली खेली जाती है। बरसाने की गोपियां यानी महिलाएं सखाओं को प्रेम से लाठियों से पीटती हैं और सखा उनसे बचने की कोशिश करते हैं। इस दौरान गुलाल-अबीर उड़ाया जाता है।
6 मार्च: वृंदावन में फूलों की होली
बांके बिहारी मंदिर में रंगभरनी एकादशी पर फूलों की होली खेली जाती है। ये सिर्फ 15 से 20 मिनट तक चलती है। इस होली में बांके बिहारी मंदिर के कपाट खुलते ही पुजारी भक्तों पर फूलों की वर्षा करते हैं।
7 मार्च: गोकुल की छड़ीमार होली
यहां उनके बालस्वरूप को ज्यादा महत्व दिया जाता है। इसलिए श्रीकृष्ण के बचपन की शरारतों को याद करते हुए गोकुल में छड़ीमार होली खेली जाती है। जिसमें गोपियों के हाथ में लट्ठ नहीं, बल्कि छड़ी होती है और होली खेलने आए कान्हाओं पर गोपियां छड़ी बरसाती हैं।